Friday, April 10, 2009

रोंक सकता नहीं तुम्हें ज़माना,
ज़माने की बातों में तुम न आना।
होगा पूरा हर सपना, वो अपना,
अगर जो तुमने दिल में ठाना।
~Imm




सतीश कौशिक


जब भी कभी मैं पीछे मुड कर देखता हूं तो पाता हूं कि मेरे अंदर बदलाव बहुत आया है। जब मैं फिल्मी दुनिया में आया तो यहां मेरा अपना कोई नहीं था। मुझे अपनी बात लोगों तक पहुंचाने और अपने को साबित करने में समय लगा। उस समय नादिरा बब्बर, जावेद अख्तर, बोनी कपूर, शेखर कपूर, अनिल कपूर जैसे लोग न मिलते तो मैं अपनी बात कैसे किसी के आगे रख पाता? मैंने जब 1980 में फिल्मी दुनिया में कदम रखा तो रास्ता आसान नहीं था। अब मेरे अंदर इतना आत्मविश्वास है कि मैं अपनी बात किसी से मनवा सकूं। यह पहले संभव नहीं था। कोई कुछ सुनने को तैयार ही नहीं होता था। यह स्थिति बनने में कई साल लगे। अगर आपमें प्रतिभा है और खुद को साबित करना चाहते हैं तो मौका जरूर मिलेगा। ऐसा ही मेरे साथ हुआ। मैं एक साधारण व्यक्ति से कामयाब और मजबूत व्यक्तित्व बन सका। इससे ये समझ में आया कि व्यक्ति को हमेशा अपने आपको सिद्ध करते रहना चाहिए। मनुष्य हमेशा नई-नई चीजें सीखता रहता है। इसकी कोई समय सीमा नहीं है। बदलाव की वजह कुछ भी हो सकती है, पर एक बात हमेशा ध्यान में रखनी होगी। वह यह कि किसी के भी व्यक्तित्व को आप ओढ नहीं सकते। आपको अपनी जगह खुद बनानी पडती है। किसी से प्रेरणा भले ही लें, पर वैसे ही बनें यह जरूरी नहीं है।


हर व्यक्ति का अलग-अलग व्यक्तित्व होता है और उसके लिए वही उपयुक्त होता है। अगर व्यक्ति सीधा-सादा और सरल है तो उसे बेवकूफ न समझें। असल में वही उसकी शख्सीयत है। यह फैसला आपको खुद करना होता है कि आप कैसा व्यक्तित्व अपनाएं। जीवन में आपका अपना तजुर्बा ही सही दिशा में ले जाता है। जब मैं लोगों से मिलता हूं तो उनके अच्छे गुणों को समझने की कोशिश करता हूं। मैं राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म बनाने के लिए सूरज बडजात्या या राजकुमार बडजात्या से बात करता हूं। उनकी कहानी सुनता हूं, तो कहीं न कहीं मैं उनके अच्छे विचारों से सहमत होता हूं। इस मामले में मैं जावेद अख्तर से काफी प्रभावित हूं। अपनी बात कहने का उनका ढंग बिलकुल अलग है। मेरे जीवन में बदलाव सही मायने में तब आया जब मैं नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में था। उन्हीं दिनों मैंने चार्ली चैप्लिन की जीवनी पढी। उसे पढकर मेरे अंदर बहुत बदलाव आया। इसके पहले मैं विज्ञान का छात्र था। वहां मैंने कई बडे लेखकों की किताबें पढीं और अनुभव प्राप्त किए।


इसके साथ-साथ सन् 2006 में ब्रुकलिन पर आधारित एक अंग्रेजी फिल्म में काम करने का अवसर मिला। असल में यही मेरे जीवन का टर्निग पॉइंट था। इसके लिए मैं तीन महीने तक अमेरिका में रहा। वहां उस फिल्म की शूटिंग, रिहर्सल, डायलॉग याद करना मेरे लिए काफी मुश्किल था। पर मैंने यह सब किया और वह सफल रहा। मैंने अपने जीवन में कभी नकारात्मक सोच नहीं रखी। किसी भी रचनात्मक क्षेत्र में हमेशा सकारात्मक सोच ही रखनी पडती है। अगर मेरी सोच नकारात्मक होती तो शायद मैं इस मुकाम तक पहुंच नहीं पाता।


~Source: Dainik Jagaran~


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4 comments:

Anonymous said...

DON'T UNDERSTAND HINDI TOO WELL.. WHY DON'T U TRANSLATE IN ENGLISH.

Manjesh said...

Dear Friend,

I really feel sorry for not uploading some Messages in English, first it is time consuming and second I am not that much expert in English to present the same feelings and emotions in English after translation…

Regards
Manjesh

Anonymous said...

Dont take all the trouble..Its ok then, if i miss out some of your feelings n emotions in hindi..your feelings n emotions in english were a handful!!

Anonymous said...

Here s a nice poem that i hv just pasted on my cabin wall..

DON'T QUIT

When things go wrong as they sometimes will,
When the road you 're trudging seems all uphill,
When the funds are low, and the debts are high,
And you want to smile, but you have to sign,
When care is pressing you down a bit,
REST if you must , but don't you QUIT!!!!